एक बार कहकर देखें खुद से- जो बीत गई सो बात गई

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हरिवंशराय बच्चन का जन्म इलाहाबाद के पास प्रतापगढ़ जिले के एक छोटे से गांव पट्टी में हुआ था। इन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए किया। काफी समय तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में ही पढ़ाते रहे। इसके बाद वह इंग्लैंड चले गए और वहां कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अंग्रेजी साहित्य पर शोध किया। वहां से वापस आकर भारत सरकार के विदेश मंत्रालय में हिंदी विशेषज्ञ के तौर पर कार्य किया। इनकी कविताओं में जिंदगी से जुड़ी उम्मीद हर बार नये रूप में सामने आती है। जब हम निराश होने लगते हैं, तो हरिवंशराय की कविताएं हमें आशा की दुनिया में ले जाती हैं। जहां फिर से जीने और कुछ करने का संबल मिलता है। इस बार Monday Blues को दूर भगाने के लिए उनकी एक कविता-

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक स‌ितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई
मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई।

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